You are here

मुख्‍य पृष्‍ठ प्रकाशन जल की प्रत्येक बूंद से अधिक फसल और आयसंबंधी रिपोर्ट

जल की प्रत्येक बूंद से अधिक फसल और आयसंबंधी रिपोर्ट

जल संसाधन मंत्रालय, भारतसरकार

''जल की प्रत्येक बूंद से अधिक फसल और आय'' संबंधी रिपोर्ट

1. पृष्ठभूमि

जल संसाधन मंत्रालय ने माननीय जल संसाधन मंत्री प्रो. सैफुद्दीन सोज की अध्यक्षता में भूमि-जल के कृत्रिम पुनर्भरण संबंधी सलाहकार परिषद का गठन किया था। परिषद की पहली बैठक 22 जुलाई, 2006 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में हुई और इसका उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने किया। अपने आरंभिक भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि ''हमें अपने जल उपयोग को कम करना होगा- विज्ञान और प्रौद्योगिकी में निवेश करना होगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हम ऐसी फसलें उगा सकें जिनमें कम पानी का उपयोग हो। दूसरे शब्दों में हमें जल की प्रत्येक बूंद से फसल उगाने का आंकलन करने के तरीके ढूंढने होंगे।'' प्रधानमंत्री के सुझाव को कार्यान्वित करने के लिए परिषद ने अपनी पहली बैठक में डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक उप-समिति गठित की जो ''जल की प्रत्येक बूंद से अधिक फसल और आय'' पर एक रिपोर्ट तैयार करेगी। उप-समिति में कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड, सीजीडब्ल्यू, सीडब्ल्यूसी, भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के प्रतिनिधि और आईएआरआई, सीआरआईडीए, सीएजेडआरआई, आईसीआरआईएसएटी तथा राज्य/केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालयों/ संस्थानों के कृषि वैज्ञानिक शामिल थे। उप-समिति ने अपनी रिपोर्ट के लिए दो महत्वपूर्ण चिंतन सत्र आयोजित किए। डा. स्वामीनाथन ने 2 अक्तूबर, 2006 अर्थात् गांधी जयंती को माननीय जल संसाधन मंत्री को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

इस अवसर पर बोलते हुए डॉ. स्वामीनाथन ने कहा कि रिपोर्ट में उपयोज्य कार्य योजनाओं प्रौद्योगिकियों तथा इसकी अर्थक्षमताओं का ब्यौरा दिया गया है। रबी की फसल के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों को रेखाकिंत किया गया है ताकि आगामी रबी के मौसम से कार्रवाई शुरू की जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट 2 अक्तूबर अर्थात् महात्मा गांधी के जन्मदिन पर प्रस्तुत की जा रही है ताकि हमें गांधीजी के इस कथन ''प्रकृति ने हरेक की जरूरत के अनुसार दिया है नाकि प्रत्येक के लालच के अनुसार'' के पीछे के शाश्वत सत्य का स्मरण हो। इस दिन हम स्वयं को हरित क्रांति के प्रसार को जल-स्वराज के सिद्धान्त पर आधारित सदैव-हरित क्रांति से प्रतिस्थापित करने के प्रति समर्पित करते हैं। उन्होंने यह आशा भी व्यक्त की कि सरकार उप-समिति की सिफारिशों को स्वीकार करेगी जो कृषि आदान और किसानों की परिणामी आय को बढाने में काफी लाभदायक सिद्ध होगी। उन्होंने रिपोर्ट तैयार करने में डॉ. के पलानीस्वामी और श्री एस.एम. सूद के उल्लेखनीय योगदान के लिए उनका धन्यवाद किया।

2. जल उपयोग में प्रभावी तकनीकों और आर्थिक लाभ का प्रसार करना:

विभिन्न कृषि परिस्थितिकी क्षेत्रों में विभिन्न संस्थानों द्वारा सफल तकनीकों को पहले ही विकसित किया जा चुका है और उन्हें वृहत समुदाय के लाभ के लिए उन्नत बनाए जाने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में 2 मी. हेक्टेयर जलभराव क्षेत्र जो व्यापक बेड और फरो (बीबीएफ) वाला है, सम्राट जैसी अल्पावधि सोयाबीन की किस्म तथा संतुलित पोषक विकल्प और मटर/गेहूँ की फसल हेतु न्यूनतम जुताई किसान की आय को दुगना और भू-क्षरण को न्यूनतम कर सकती है। सिंधु गंगा के मैदानी इलाकों (आईजीपी) में एकल बीज प्रिमिंग तकनीक अर्थात् मटर के दानों को छह घंटों तक पानी और सूक्ष्मपोषक घोल में डुबोकर तथा उन्हें छाया में सुखाने से चावल प्रवण क्षेत्रों में मटर की अच्छी फसल होने और फसल उत्पादन तथा अवशिष्ट मृदा नमी का उपयोग करके आय में वृद्धि होने की अच्छी संभावना है। इस तकनीक का भारत में मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, पश्चिमी बंगाल और छत्तीसगढ़ में 12मी. हेक्टेयर चावल वाली भूमि में प्रयोग किया जा सकता है।

कश्मीर क्षेत्र में, उत्पादक अवधि के दौरान 10 सिंचाइयों में 70मी. 3/हेक्टेयर की दर से लघु सिंचाई केसर की उत्पादकता को 50 प्रतिशत से अधिक बढा सकती है। कारेवास में दबावीकृत सिंचाई प्रणाली का उपयोग करके सेब की पैदावार को 40/हेक्टेयर से अधिक बढाया जा सकता है। खुले की बजाय कम लागत वाले पॉली हाउस में स्ट्राबेरी की फसल 45 दिन पहले पक जाती है और इसकी उत्पादकता में भारी वृद्धि होती है।

तमिलनाडु में गन्ने में सिंचाई की ड्रिप और फर्टीगेशन तथा पिट विधि वाली सूक्ष्म कृषि दृष्टिकोण अपनाने से फसल की पैदावार और आय में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। गुजरात में, ड्रिप वाली धान की जी-9 किस्म ने अधिक जल उपयोग क्षमता के साथ फसल की उत्पादकता में 2.5 टन/हेक्टेयर की वृद्धि कर दी है। तटीय क्षेत्रों में, तटीय उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र जलभराव वाला है। जलकृषि तालाब खोदने से तटबंध के अंतर्गत लगभग 35 प्रतिशत क्षेत्र 1-1.5 मी. ऊपर उठ गया है। खोदे गए तालाबों में मछली और झींग पालन तथा तटबंधों में फल और सब्जियां तथा खेत में चावल उगाने से जल उत्पादन में सात गुना वृद्धि हुई है।

3 मुख्य बातें:-

चावल तीव्रीकरण तकनीक (एसआरआई) की प्रणाली को लोकप्रिय बनाना आवश्यक है जिसके लिए कम गुणवत्ता वाले बीज, कम नर्सरी क्षेत्रकी जरूरत होती है। इसमें जल और श्रम की बचत होती है और पैदावार बढ़ती है। इसी विधि को गन्ने जैसी अन्य फसलों के लिए भी अपनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त आवधिक गीला करना और सुखाना जैसी अपलैंड चावल तकनीकों का भी, जहां कहीं संभव हो, विस्तार किया जाना चाहिए। इससे चावल के खेतों में मच्छरों के प्रजनन पर नियंत्रण पाने में भी सहायता मिलेगी।

लघु सिंचाई तकनीक उदाहरणों के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तथा ड्रिप फर्टीगेशन को कम जल के उपयोग से फसलों की उत्पादकता को बढाने वाली तकनीक को भी सरकार के पर्याप्त सहयोग से लोकप्रिय बनाया जाना चाहिए। उपकरण के भुगतान हेतु किसानों को आवश्यक क्रेडिट सुविधाएं कराई जानी चाहिए।

हमारी मिट्टी अधिक पोषक नहीं है इसलिए समेकित पोषण प्रबंधन के माध्यम से मिट्टी में पर्याप्त और संतुलित पोषक तत्वों की आपूर्ति से मृदा स्वास्थ्य और फसलों की पैदावार में वृद्धि होगी। सूक्ष्म पोषण तत्वों जैसे-जिंक, बोरोन और सल्फर की आपूर्ति पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

चूंकि विभिन्न मौसमों में पानी की कमी अनुभव होती है इसलिए दलहन और तिलहन जैसी कम पानी की जरूरत वाली किंतु अधिक मूल्य वाली विविधीकृत फसलों को बढावा दिया जाए और पानी के विविध उपयोग से पैदावार और किसानों की आय में वृद्धि होगी। आमतौर पर किसान मूल्य अनिश्चितता का सामना करते है। अत: किसानों को विपणन तथा बाजार की जानकारी देने हेतु पर्याप्त सहायता दी जाए। कृषि प्रणालियों के उपयुक्त मॉडल यथा फसल, पशुधन, समेकित कृषि को बढावा दिया जाए और किसानों की भागीदारी से इसका प्रयोग किया जाए।

चूंकि अनिश्चित मौसम के दौरान फसल बीमा किसानों के हितों की रक्षा करेगा इसलिए किसानों के नुकसान को कम करने हेतु मौसम आधरित फसल बीमा की भी सिफारिश की गई है। बैंकों, किसानों, व्यापारियों, प्रसंस्करणकर्त्ताओं, निर्यातकों, एनजीओ, पंचायतों तथा सरकारी विकास विभागों के समन्वय से सजातीय क्षेत्र के लिए क्रेडिट आधारित विकास योजना तैयार की जा सकती है।

सिफारिश को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए गांव, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक त्रि-स्तरीय ढांचा बनाने का सुझाव दिया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की एक संचालन समिति, जिसमें सिंचाई, कृषि और योजना आयेाग, वित्त, नाबार्ड, मास मीडिया आदि से संबद्ध विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि शामिल होंगे, बनाई जाए। यह समिति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कृषि समन्वय समिति को अपनी रिपोर्ट देगी।

विषय के महत्व को देखते हुए जल नियंत्रण उपायों, सिंचाई परियोजनाओं की बेंचमार्किंग, जल संचयन मानकों में सुधार, मुख्य जल संचयन घटकों के रूप में तालाबों और जलाशयों जैसे जलापूर्ति से वृद्धि के उपायों को शामिल करने हेतु ग्यारहवीं योजना में पर्याप्त प्रावधान किए गए। मांग प्रबंधन हेतु लघु सिंचाई तकनीकों जैसे ड्रिप/स्प्रिंकलर, ड्रिप फर्टीगेशन, चावल तीव्रीकरण तकनीक, मृदा स्वास्थ्य में सुधार, मौसम आधारित फसल बीमा, बाजार सुधार तथा क्षमता निर्माण के प्रावधान को शामिल किया जाए। भावी मांग को ध्यान में रखते हुए, जैव प्रौद्योगिकी और जल सुरक्षा संबंधी एक अनुसंधान नेटवर्क बनाने की भी सिफारिश की गई है।

जल की प्रत्येक बूंद से उत्पादकता और आय बढ़ाने की रणनीति और उसके महत्व को देखते हुए ठोस कार्य योजना की आवश्यकता है। अत: वर्ष 2007-08 को 'जल की प्रत्येक बूंद से अधिक फसल और आय का वर्ष' घोषित किया गया और साथ ही कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, आईसीआरआईएसएटी, डब्ल्यूएएलएमआई आदि की सहायता से 5000 किसानों की भागीदारी कार्य अनुसंधान कार्यक्रम भी लागू किया गया।

किसान भागीदारी कार्य अनुसंधान कार्यक्रम से वर्ष 2007-08 में विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों वाले 5000 गांवों को कवर किया गया। ऐसे गांवों में किसान को खेतों में ले जाया गया। इन 5000 गांवों में हर पंचायत से 1 महिला और 1 पुरूष को 'वाटर मास्टर' के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, जल साक्षरता अभियान भी शुरू किया जाएगा। इस कार्यक्रम में 50 कृषि विश्वविद्यालय, आईसीएआर संस्थान, आईसीआरआईएसएटी और डब्ल्यूएएलएमआई की भागीदारी होगी। प्रभावी उपयोग के माध्यम से जल की बचत और अर्जित अतिरिक्त आय दोनों, के आंकडों की गणना की जाएगी।

गांवों में ग्राम सभाएं पानी-पंचायतों के रूप में काम करेंगी और इस कार्यक्रम को समग्र मार्ग निर्देश तथा सहायता प्रदान करेंगी। किसान भागीदारी कार्य अनुसंधान परियोजनाओं को इस प्रकार तैयार किया जाएगा कि 25 करोड़ रुपए के परिव्यय वाला एक छोटा सा सरकारी कार्यक्रम भी जल की प्रत्येक बूंद से अधिक पैदावार और आय कमाने वाला जन आंदोलन बन जाए।