सिचाई परियोजनाएं तीन श्रेणियों अर्थात बृहद, मध्यम और लघु में रखी जाती हैं। जिन परियोजनाओं का कृषि-योग्य कमान क्षेत्र (सीसीए) 10,000 हैक्टेयर से अधिक होता है, उन्हें बृहद परियोजनाएं कहा जाता है और जिन परियोजनाओं का कृषि-योग्य कमानक्षेत्र 10,000 हैक्टेयर से कम किन्तु 2,000 हैक्टेयर से अधिक होता है, वे मध्यम परियोजनाएं कहलाती हैं। जिन परियोजनाओं का सीसीए 2,000 हैक्टेयर या इससे कम होता है, वे लघु परियोजनाएं कहलाती हैं। जो क्षेत्र अन्ततः सतही तथा भूजल--दोनों द्वारा सिंचाई के अधीन लाया जा सकता है, उसके बारे में विभिन्न राज्यों द्वारा 1960 के दशक में किए गए एक स्थूल मूल्यांकन से ऐसा पता चला है कि देश की सिंचाई की अन्तिम क्षमता 113 मिलियन हैक्टेयर भूमि की होगी। लेकिन अन्तिम क्षमता 139 मिलियन हैक्टेयर है, इस वृद्धि का मूल कारण लघु भूजल स्कीमों और लघु सतही जल स्कीमों की आकलित क्षमता में क्रमशः 64 मिलियन हैक्टेयर तथा 17 मिलियन हैक्टेयर तक का बढ़ने वाला संशोधन है। लघु सिंचाई परियोजनाओं के स्रोत के रूप में सतही और भूजल दोनों होते हैं जबकि बृहद और मध्यम परियोजनाएं अधिकतर सतही जल संसाधनों का दोहन करती हैं।
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